Wednesday, July 3, 2019

बियाबान जंगली पथरीले उन्हीं परपरागत निर्दय रास्तों से गुजरते पहुंच चुका हूँ आज उस मुकाम में जहाँ तुम मेरे बेहद करीब हो... तुम्हारे अस्तित्व के मोहक संमन्दर से उठती भीनी-भीनी खुशबू मेरी जिंदगी की सूख रही जड़ों को प्रेम की शीतल लहरों से सराबोर कर देती है... अपेक्षा के उन्माद में खुद को भूल चुका मै तुम्हारें प्रेम के अमरत्व का पान कर अपनें वजूद को तुम्हारी शान्त,चन्दन सरीखी निर्मल बाहों में खोना चाहता हूँ. क्योंकि जिन्दगी की सार्थकता  केवल तुझमें लय होना है...

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